Mamta - 1 in Hindi Women Focused by kalpita books and stories PDF | ममता ...एक अनुभूति... - 1

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ममता ...एक अनुभूति... - 1

केशव किसी तरह धक्कामुक्की से निकलते हुए सप्त क्रांति ट्रेन में चढ़ पाया।
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन लोगों से खचाखच भरा हुआ था—
किसी की आँखों में बिछड़ने का दर्द था, तो किसी के चेहरे पर मिलने की खुशी।
शोर-गुल, पुकारते कुली, रोते बच्चे और विदाई के आँसू... सब कुछ मिलकर एक अजीब-सी हलचल पैदा कर रहे थे।


बस हर कोई अपने-अपने सफ़र में डूबा है।
वो मन ही मन बुदबुदाया—
"ना मंजिल का पता...ना है कोई ठिकाना
मुसाफ़िर हूँ यारो… काम है तो बस चलते जाना।"

अपने डिब्बे में पहुँचकर केशव ने हाथ में टिकट देखा और फिर नजरें सीट नंबर पर टिकाईं।
उसकी भौंहें तन गईं।
सीट पर एक युवती  बैठी थी।

केशव ने हल्की झुंझलाहट भरे स्वर में कहा—
“मैडम, आप गलत सीट पर बैठी हैं… ये मेरी सीट है।”

युवती पूरी तरह से कपड़ों से ढकी हुई थी—दुपट्टा सिर से लेकर चेहरे तक, जैसे दुनिया से छुप जाना चाहती हो।
उसने कुछ कहे बिना बस हाथ के इशारे से केशव को साथ बैठ जाने को कहा और खुद खिड़की की तरफ और सिमट गई।

केशव कुछ बोलने ही वाला था कि उसकी नजर युवती की गोद पर पड़ी।
वो ठिठक गया—
गोद में एक नन्हा-सा नवजात शिशु था, हल्के-हल्के कसमसाता हुआ।

उसने युवती की आँखों में झाँका—थकी हुई, पीली-सी।
ऐसा लग रहा था मानो उसने अभी-अभी बच्चा जन्मा हो और सीधे अस्पताल से भागकर ट्रेन में आ बैठी हो।

केशव के दिल में अचानक ही झुंझलाहट की जगह चिंता उमड़ आई।
"कौन है ये? अकेले सफ़र क्यों कर रही है? और इतनी जल्दी क्यों…?"
उसके मन में सवालों का तूफ़ान उठने लगा।

पर उसने अपने दिमाग पर सवालों का बोझ हावी नहीं होने दिया।
डिब्बा अब लोगों से खचाखच भर चुका था।
भलाई इसी में थी कि चुपचाप उस लड़की के पास बैठ जाए।

वैसे भी उसे दिल्ली रास नहीं आई थी।
“दिल्ली वालों के पास पैसा तो है, पर दिल नहीं…”
अक्सर यही सोच मन को कचोट देती थी।

पिछले पाँच साल उसने मशीन के कल-पुर्ज़े बनाने वाली एक फैक्ट्री में सेल्स का काम किया था।
रोज़ दफ्तर की भागदौड़, टारगेट्स, और बॉस के ताने—सब कुछ सहा।
पर अबकी बार चार महीने से सेल्स गिर गई, और मालिकों ने बिना कुछ सोचे-समझे निकाल फेंका।

किससे कहता, क्या कहता…
बस चुपचाप अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर निकल पड़ा बिहार की ओर—अपने गाँव, अपनी मिट्टी, अपनी माँ के पास।

दिमाग पहले ही भन्नाया हुआ था, उस पर यह रहस्यमयी लड़की और उसकी गोद में छुपा नन्हा बच्चा…
केशव की बेचैनी बढ़ रही थी, पर होंठ अब भी खामोश थे।

वो चुपचाप उस लड़की के पास बैठ गया।
लड़की जैसे ही महसूस करने लगी कि कोई उसके बगल में है, उसने अपने आप को और ज्यादा समेट लिया—खिड़की से चिपककर।

केशव को लगा कि उसके शरीर में कंपन है।
वो सचमुच काँप रही थी।

उसकी नज़र एक बार फिर उसकी गोद की ओर गई।
नन्हा-सा बच्चा… बेहद मासूम चेहरा… और साँसें भी मानो अभी-अभी इस दुनिया में आई हों।

केशव की धड़कन तेज़ हो गई।
"ये… ये तो एक-दो दिन का भी नहीं लगता… शायद कुछ ही घंटे पहले जन्मा होगा…"

उसका चेहरा सख़्त पड़ गया।
मन में सवाल बिजली-सी कौंधा—
"कहीं से चुरा कर तो नहीं लाई बच्चा?"

दिल ने दिमाग को झटका—
"नहीं-नहीं… पर अगर ऐसा है तो? इतनी अकेली औरत, इतनी थकी हुई, और इतने छोटे बच्चे के साथ…"

वो उलझन में बैठा रह गया।
आसपास शोर-गुल, लोगों की बातें, बच्चों की रोने-हँसने की आवाज़ें सब सुनाई दे रही थीं… पर केशव के कान अब सिर्फ उस नवजात की धीमी साँसों पर टिके थे।

केशव की सारी शंका पर पूर्णविराम लग गया।
लड़की ने अपने दुपट्टे के आंचल को और फैला लिया और बच्चे को अपने वक्ष से लगाकर दूध पिलाने लगी।
अब साफ़ हो चुका था—बच्चा उसी का है।

केशव ने गहरी सांस ली, मगर तभी डिब्बे में हलचल मच गई।
स्टेशन से चढ़े कुछ लोग हाथों में लाठियाँ थामे अंदर आए।
उनके चेहरे पर शिकारी जैसी कठोरता थी।
एक के हाथ में किसी औरत की तस्वीर थी—वही तस्वीर सबको दिखाते हुए वे इधर-उधर झाँक रहे थे।

"देखा कहीं इसको?"
उनमें से एक भारी आवाज़ में पूछ रहा था।

पूरा डिब्बा सन्नाटे में डूब गया।
लोग चुपचाप सिर झुका कर बैठ गए, जैसे उनसे कोई लेना-देना न हो।

केशव का दिल धक-धक करने लगा।

लड़की अचानक केशव के और सिमट गई।
उसके कांपते हाथ ने कसकर उसकी बाँह पकड़ ली, जैसे डूबते इंसान ने तिनके का सहारा पकड़ लिया हो।

केशव सन्न रह गया।
उसकी बाजू पर उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि डर और बेचैनी की पूरी कहानी बयां कर रही थी।
उसके हाथ का कंपन सीधे केशव के दिल तक पहुँच रहा था।

केशव को अचानक समझ आ गया—
यही वही है, जिसे ये लोग ढूंढ रहे हैं…!

क्यो और कौन था जो उस लड़की को ढूंढ रहा था?
केशव उस लड़की की मदद करेगा या वो लड़की केशव के लिए मुसीबत बन जायेगी? 
.......to be continued